शुक्रवार, 10 जून 2011

बिखरे विरोध से क्या बनना ?



बाबा हों
या फिर हों अन्ना
बिखरे
विरोध से क्या बनना ?
जनता है,
दल में बटी हुई,
मुमकिन न,
चेतना का जनना |

जहाँ भ्रष्ट की,
लाठी खाकर भी,
जनता,
बिभक्त-सुर गान करे,
वहाँ जन-रक्षक,
बन कर भक्षक,
सत्ता का
क्यों न गुमान करे ??

है मुर्ख
वे जो कुछ
टोली में सरकार
हिलाने निकले है,
शोषित ओ कुपोषित
जनता को,
निद्रा से
जगाने निकले है |

है भ्रष्ट जो
ये सरकार,
हमारे दम है,
है जनक,
है पालनहार,
विनाशक हम है |

सरकार
खड़ी है हमसे,
हमने भष्मासुर
पाले है,
वे मुक्त,
हमही को
लूट सकें,
अधिकार
सभी दे डाले है |

गर लड़ना है
उनके विरुद्ध,
तो खुद निज
से लड़ना होगा,
व्यक्ति विशेष,
जाती, धर्म, दल
से ऊपर बढ़ना
होगा |

जब जन-जन
होगा एक राह,
थम सकेगा ना
पैना प्रवाह,
तब स्वतः क्रांति
उदय होगी,
होगी पूरी
जन-गण की चाह |

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