सोमवार, 24 मार्च 2014

घर-घर मोदी, स्वर-स्वर मोदी



घर-घर मोदी,
स्वर-स्वर मोदी,
 देव भूमि से
गूंज रहा,
चहुँदिश नमो,
निरंतर मोदी ।
 
जन उदघोष,
है रण की बेला,
मारक अस्त्र,
व्युह का रेला,

प्रखर शत्रु,
प्रखरतर मोदी
|
 
घर-घर मोदी......   

जीर्ण विरासत का
अधिकारी,
भर्मित मति सा
एक मदारी,

और बचे कुछ,
निकृष्ट खिलाडी,
गर वे भूमि,
शिखर है मोदी । 

घर-घर मोदी.......  

केंद्रित दृष्टि,
वेगमय रथ है,
अविचल बुद्धि,
सुनिश्चित पथ है,
विजयोन्मुख,
है बेहतर मोदी |

घर-घर मोदी.....  

रविवार, 4 मार्च 2012

आनंद



जीवन पर्यंत,
जन्मों-जन्मों की,
खोज भिन्न
एक सार,
आनंद स्वरुप
अंश जग सारा,
आनंद
जगत आधार |

हास्य-रुदन,
निद्रा-जगन,
कुछ पाने
कुछ खोने में,
सूक्षम दृष्टि
यदि डालें तो,
आनंद छुपा
हर होने में |

आनंद !
मूलतः दो विभाग,
एक पाय
घटे,
एक बढ़ता है,
एक
जन्म-मरण
पथ का दायी,
एक
मुक्ति श्रोत
श्रुति कहता है |

आनंद
जगत का
क्षणिक है,
क्षय मुक्त
नहीं परिमाण,
सच्चिदानंद
तो एक हैं,
वो सर्वेश्वर,
भगवान |

शनिवार, 26 नवंबर 2011

पश्चिम या पूरब ?

पश्चिम,
पूरब की
खीच तान,
रच रहें
द्वन्द,
विचलित है
प्राण |

बाहर
भागूँ,
अन्दर
जागूँ,
है विकट प्रश्न,
मुश्किल
निदान |

कभी
मूल्य को
रखकर
कोने में,
सुख पाऊ
जग का
होने में,
घुटते
अन्तर से
व्यथित हुआ,
कभी
समय बिताऊ
रोने में |

सोचूं
बीते से
बंधा हुआ
मै आज
कहाँ उठ
पाउँगा ?
कल तजा
यदि,
उठ गया भी
जो,
अन्तर को
रौंद
न जाऊंगा ?

कभी,
उन्मुक्त
जीविका
सीखा रही,
पश्चिम की
हवा
सुहाती है,
कभी
सद्चरित्र,
सुगठित रहन,
पुरखो की
मन को
भाती है |


पश्चिम,
पूरब की
खीच तान,
रच रहें
द्वन्द,
विचलित है
प्राण |

बाहर
भागूँ,
अन्दर
जागूँ,
है विकट प्रश्न,
मुश्किल
निदान |

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

नदिया प्रीत निभाना जाने |



प्रेम तपिश से
बने तरल,
बढ़ चले,
कठिन
या राह सरल,
थके नहीं,
ना थमे कहीं,
वो सागर से
मिल जाना जाने,
नदिया,
प्रीत निभाना जाने |

वो पली
भले हों,
गिरि शिखर,
झुक चले हमेशा
प्रेम डगर,
सर्वस्व समर्पण हेतु
वो निज का,
उन्नत शीश,
झुकाना जाने,
नदिया,
प्रीत निभाना जाने |

हो
बहे गाँव
या कोई शहर,
दूषित तत्व
लय आठों पहर,
अविरल बहकर,
निर्मल रहकर,
वो अपना धर्म
बचाना जाने,
नदिया,
प्रीत निभाना जाने |

थलचर,
नभचर
या हो जलचर,
कोई भेद न
करती वो उनपर,
वह नेह की
व्यापक सोच लिए,
हर शय को
तृप्ति दिलाना जाने,
नदिया,
प्रीत निभाना जाने |

शुक्रवार, 10 जून 2011

बिखरे विरोध से क्या बनना ?



बाबा हों
या फिर हों अन्ना
बिखरे
विरोध से क्या बनना ?
जनता है,
दल में बटी हुई,
मुमकिन न,
चेतना का जनना |

जहाँ भ्रष्ट की,
लाठी खाकर भी,
जनता,
बिभक्त-सुर गान करे,
वहाँ जन-रक्षक,
बन कर भक्षक,
सत्ता का
क्यों न गुमान करे ??

है मुर्ख
वे जो कुछ
टोली में सरकार
हिलाने निकले है,
शोषित ओ कुपोषित
जनता को,
निद्रा से
जगाने निकले है |

है भ्रष्ट जो
ये सरकार,
हमारे दम है,
है जनक,
है पालनहार,
विनाशक हम है |

सरकार
खड़ी है हमसे,
हमने भष्मासुर
पाले है,
वे मुक्त,
हमही को
लूट सकें,
अधिकार
सभी दे डाले है |

गर लड़ना है
उनके विरुद्ध,
तो खुद निज
से लड़ना होगा,
व्यक्ति विशेष,
जाती, धर्म, दल
से ऊपर बढ़ना
होगा |

जब जन-जन
होगा एक राह,
थम सकेगा ना
पैना प्रवाह,
तब स्वतः क्रांति
उदय होगी,
होगी पूरी
जन-गण की चाह |

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

रिश्तों के रखाव में : गुरु के प्रति समर्पण



रिश्तों के
रखाव में
सहजता का
आभाव क्यु ?

तत्क्षण
दे दी थी
गुरु दक्षिणा
अंगूठे की
एकलव्य ने
द्रोण को |

न सोचा,
बस
रख दिया
अपना
जीवन संचय
कदमो
में उनके,
जिनसे
न कुछ
जाना था,
जो गुरु थे
नहीं,
जिन्हें
बस गुरु
माना था |

पर आज इन
रिश्तों में
श्रद्धा,
समर्पण का
प्रतिक्षण होता
गिराव क्यों ?

रिश्तों के
रखाव में
सहजता का
आभाव क्यु ?

(नायेदा जी की काव्य श्रंखला से प्रभावित)

सोमवार, 14 मार्च 2011

युक्ति-विजय



मानव
अहम् जनित
मेधा से
चाहे प्रकृति
विजय है,
दैवीय सत्ता
वाम होत जब
क्षण में होत
प्रलय है |

ईश्वर ने है
रचा श्रृष्टि,
जो जीवों का
रखवाला
सर्व समर्थ
वो ईश-तुल्य,
नर
भूल गया
मतवाला |

निज उन्नति
की चरम चाह,
कीमत
जगति का
क्षय है,
करता आवाहन
महाकाल का,
कहता
गीत-विजय है !

सह उन्नति
हीं
निज उन्नति
का
मूल मन्त्र
है भाई,
जिस
साख पे बैठे
उसे काटते
तिस पर
आत्म-बड़ाई !

तुम बढ़ो
सदा उस ओर,
की जगति
बल पाए,
फुले - फले,
स्नेह के मोती
बिखराए |

यूँ
सह उत्थान में
जगत भलाई
तय है,
जियो
और जीनें दो,
युक्ति
विजय है |