शनिवार, 22 जनवरी 2011

माँ की गोद



माँ
के सानिध्य
से दूर शिशु को,
ज्यूं
उनकी गोद
सताती है,
त्यूं
मातृभूमि
की याद
हृदय को
बींध - बींध
तड़पाती है |

ज्यूं
घोर शिशिर में
दीप्त दिवाकर
की
किरणे
हर्षाती है,
त्यूं
दूर बसे को
जन्मभूमि की
यादें बहुत
सुहाती है |

हम
उठें भले ऊँचे
की अम्बर
छू जाएँ
पर जड़ें
ही हैं
जो हमको
पोषण पहुचाएँ ,
जो पेड़ जड़ों
से छिन्न - भिन्न
हों जाते है,
वो शुष्क - ह्रदय
कहीं दूर पड़े
पछताते हैं |

कुछ
वृक्ष तो अपनी
नियति मान
खो जाते है,
पर कुछ अपने
अंतर को जागृत
पाते है,
जो
जाग गए,
वो
देर से ही,
मुड जाते हैं
और मुड़ते ही
वे स्वतः
ही फिर
जुड़ (जड़ों से )
जाते है |

ये
तरु, मूल
का मिलन,
तो कुछ
फिर यूँ
दोनों को
भाता है,
ज्यूं
मरणसेज
पर पड़ा कोई,
उठ
अपनों
से मिल
जाता है |

1 टिप्पणियाँ:

ManPreet Kaur ने कहा…

very nice.. acha laga pad kar..
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