गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

बचपन



चंचल, बोधरहित, मनभावन, सहज, सरल, मन ऊपवन
स्वतः प्रेम जागृत कर जाये, कितना प्यारा बचपन

रंच मात्र का लोभ नहीं, ना राग - द्वेष की बातें
मस्ती का वह जीवन बीता, बाकी केवल यादें

वो क्षण भर,मन का रूठना, अगले पल ही धूम मचाना
जटिल बड़ा लगता अब सबकुछ, वो सामर्थ्य नहीं, पहचाना

वो भूल कोई कर, डर, माँ के आँचल छिप जाना
कितना साहस भर जाता था, वो स्नेह शरण का पाना

बचपन की वो हंसी ठिठोली, ख्वाबो की मुक्त उडानें
आज बंधा सा लगता जीवन, बचपन क्या, अब जानें

काश यदि होता संभव, वक़्त को, उल्टे पैर चलाना
जग जीवन से, राहत कितना, देता बचपन का आना

5 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा ने कहा…

काश ! संभव होता उल्टे पैरों पीछे लौटना,
काश ! वही राग द्वेष से अलग बचपन होता
कोई छल नहीं,छद्म राग नहीं....... मासूमियत और
माँ के आँचल का हल होता.....
बहुत मासूम से भाव हैं,आज की आपाधापी से अलग जाने की विकलता ,
बहुत बढिया ...........

अवनीश एस तिवारी ने कहा…

बन्धु,

आपकी रचना सुन्दर भी है और छंदात्मक लगी |
भाव और शब्द चयन अच्छी बनते लग रहें हैं |

मेरी बधाई |
आपका मित्र,
अवनीश तिवारी

Harkirat Haqeer ने कहा…

बचपन की वो हंसी ठिठोली, ख्वाबो की मुक्त उडानें
आज बंधा सा लगता जीवन, बचपन क्या, अब जानें

काश यदि होता संभव, वक़्त को, उल्टे पैर चलाना
जग जीवन से, राहत कितना, देता बचपन का आना

सुन्दर रचना...!!

Amit K Sagar ने कहा…

मेरे पास सिर्फ़ एक ही शब्द है; वाह!
---
जारी रहिये.

RAJ SINH ने कहा…

bachpan yad dila gaye !

HINDYUGM PAR 'NAMAMI RAMAM' KE LIYE AAPKEE TIPPANEE MERA PROTSAHAN HAI .DHANYAVAD.

RAJ SINH 'raku'

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