रविवार, 5 अप्रैल 2009

आलोचक संतुष्ट नहीं होते |


लाख जतन कर लिज्ये,
सुधा जल में ही भले धर दिज्ये,
नीम,
कड़वाहट नहीं खोते,
आलोचक,
संतुष्ट नहीं होते |

ईश् ने,
जो ग्रीष्म की दी धुप,
आलोचकों के,
मोम तन जलने लगे |

मेघ बरसाए,
जलन कुछ शांत हों,
जलमग्नता से,
त्राहि वे करने लगे |

दी शरद,
हों धुप ना जलमग्नता,
ठिठुरन बढ़ी,
तो ईश् भी अब क्या करें ?

दुर्मति की जड़ जमाई मैल,
मौषम भला कब धोते ?,
आलोचक,
संतुष्ट नहीं होते |

आलोचना,
गर हों श्रृजन हेतु,
तो वो स्वीकार्य हों,

पथ-भ्रष्ट को,
गर राह दिखलाये,
तो वो शिरोधार्य हों,

आलोचना, गर द्वेष दर्शाए,
तो तुम दिल की सुनो,
कुछ लोग,
हरदम ही मिलेगे रोते,
आलोचक,
संतुष्ट नहीं होते |

7 टिप्पणियाँ:

Neelima G ने कहा…

बहुत ही सही फ़रमाया आपने...चाहे कोई कर ले कितने भी जतन, ये आलोचक वर्ग हमेशा असंतुस्ट ही रहता है. बहुत ही बढ़िया कविता आपने इस विषय पर लिखी है.

नीलिमा

रश्मि प्रभा ने कहा…

बहुत ही गहन रचना है.....सत्य को ज्ञापित करने के लिए जिन सारगर्भित सन्दर्भों को उल्लेखित किया है,वे अद्वितीय हैं,बहुत अच्छा लगा पढना.......
आलोचना,
गर हों श्रृजन हेतु,
तो वो स्वीकार्य हों,......सच है .
,

आलोचना, गर द्वेष दर्शाए,
तो तुम दिल की सुनो,
कुछ लोग,
हरदम ही मिलेगे रोते,
आलोचक,
संतुष्ट नहीं होते | ..........बहुत ही बढिया

अवनीश एस तिवारी ने कहा…

आलोचना,
गर हों श्रृजन हेतु,
तो वो स्वीकार्य हों,

पथ-भ्रष्ट को,
गर राह दिखलाये,
तो वो शिरोधार्य हों,

sundar hai |

Sudhir ने कहा…

पियु पियु टेरत भामिनी
छिन आँगन ,छिन जात भवन में
छिन बैठत ,छिन बाहर है दौड़त
कल ना पडत ,तडफत विरहाकुल
चमकत जो दुःख दामिनी है ओढ़त

Jyotsna Pandey ने कहा…

सारगर्भित पंक्तियाँ ......
सब कुछ आपने कह दिया ,शेष कहने को नहीं कुछ .
बस ,शुभकामनाएं स्वीकार करें .....

RAJ SINH ने कहा…

sant jee bahut hee sahee kaha aapne '

apne yug ke aalochakon ne to tulsee das tak ko kharij kar diya tha .unhone to RAGHUNATH GATHA swantah sukhay hee likhee thee .
aapkee tippanee aur hind yugm par sahmati ek taakat detee hai.
samay samay par aata rahoonga .

aanandita.anna ने कहा…

अत्यंत उत्तम विचार...
आलोचक के भी धर्म.नियम..
जो ना समझे...
आलोचक नही...निंदक......
आलोचक व निंदक के बीच अंतर जानिए....

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