रविवार, 10 मई 2009

सेवा ब्रत, शूल का पथ है |


सेज नहीं है,
यह फूलो की,
नहीं,
समृद्धि का रथ है,
आग्नि क्षेत्र से,
पड़े गुजरना,
सेवा ब्रत,
शूल का पथ है |

जब नर,
निज हितलाभ द्वंद से,
ऊपर उठ जाता है,
सकल लोक कल्याण हेतु,
उर,
ज्योति जला पाता है |

जब कोई नयन,
सहज ही,
और के,
दर्द बहा जाता है,
जन समुद्र में,
फिर कही,
कोई,
मोती उभर पाता है |

जटिल बड़ी यह राह,
गृहस्थ हों,
हों छद्म वैरागी,
चल पाते है,
इस पथ को जो,
होते है,
वे बडभागी |

6 टिप्‍पणियां:

  1. जब कोई नयन,
    सहज ही,
    और के,
    दर्द बहा जाता है,
    जन समुद्र में,
    फिर कही,
    कोई,
    मोती उभर पाता है |

    kya baat kah di aapne, bahut hi satya...1 -1 shabd bol raha hai ... Just Gr8

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  2. जब कोई नयन,
    सहज ही,
    और के,
    दर्द बहा जाता है,
    जन समुद्र में,
    फिर कही,
    कोई,
    मोती उभर पाता है |......तुम्हारी लेखनी गजब का प्रभाव डालती है,सच कहूँ तो कवि जयशंकर प्रसाद और दिनकर की याद ताजा कर जाती है.....

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  3. जटिल बड़ी यह राह,
    गृहस्थ हों,
    हों छद्म वैरागी,
    चल पाते है,
    इस पथ को जो,
    होते है,
    वे बडभागी |

    बहुत खूब!
    बेहद खूबसूरती से आपने इतनी ऊंची बात कह दी ..
    शुभकामनाएं ..............

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  4. यथा नाम तथा आपका ब्लोग पहली बार देखा तो मन यहीं अतक गया बहुत सुन्दर कविता है् इस जटिल राह को भी शब्दों से कितना आसान बना दिया अच्छे शब्द्शिल्पी हो बधाइ और शुभकामनायें

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  5. जब कोई नयन,
    सहज ही,
    और के,
    दर्द बहा जाता है,
    जन समुद्र में,
    फिर कही,
    कोई,
    मोती उभर पाता है
    BADE GEHRE BHAV DAALE HAIN AAPNE APNI RACHNA MAIN........
    MARMSPARSHI.......
    SANJIVNI.......SI RACHNA....

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