रविवार, 26 अप्रैल 2009

चुनाव


जनतंत्र की है, जान ये,
धड़कन है, ये नेतागणों की,
यह शक्ति है, हर नागरिक की,
विधाता, राष्ट्र के जीवन मरण की

यह युद्ध है, मस्तक में उठती आंधियो की,
जो प्रबलतम, वेग से बहती हुई,यह बोलती है,
है हमें, इस राष्ट्र को, उचाईयो तक लेके जाना,
रास्तों के, कंटको को, है कुचल कर,पार पाना

है हमे, मंजिल पे जाकर, जीत का उद्घोष करना,
है हमें, इस राष्ट्र के, गौरव को, वापस छीन लाना
है हमें, अब यह दिखाना, है न हम सोये हुए,
तोड़ना है स्वप्न उनका, मद में जो खोये हुए

चुनना है अब हमें,जो योग्य हो, सक्षम भी हों,
राष्ट्र हित को, हों समर्पित, न्याय के संबल भी हों
हों समग्र प्रयास, घडी अब, आ चली उस कर्म की,
जीते वही,जिन कर सुरक्षित, ध्वज, न्याय की और धर्मं की

3 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

चुनना है अब हमें,जो योग्य हो, सक्षम भी हों,
राष्ट्र हित को, हों समर्पित, न्याय के संबल भी हों
हों समग्र प्रयास, घडी अब, आ चली उस कर्म की,
जीते वही,जिन कर सुरक्षित, ध्वज, न्याय की और धर्मं की ........आमीन

Udan Tashtari ने कहा…

चुनना है अब हमें,जो योग्य हो, सक्षम भी हों,
राष्ट्र हित को, हों समर्पित, न्याय के संबल भी हों
हों समग्र प्रयास, घडी अब, आ चली उस कर्म की,
जीते वही,जिन कर सुरक्षित, ध्वज, न्याय की और धर्मं की

--सामायिक-उम्दा रचना!

Jyotsna Pandey ने कहा…

आपने अपनी कविता के माध्यम से सामयिक बात कही और उसमें निहित सन्देश सार्थक है ...
मेरी शुभकामनाएं सदैव आपके साथ हैं ,निरंतरता बनाये रखें ....

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