रविवार, 28 फ़रवरी 2010

तन्हाई


सागर सी,
ये असीम जमी,
दिखती हर क्षण है,
पराई - पराई,
कहने को अथाह,
है प्रेम यहाँ ,
मिलती न मुझे,
उसकी परछाई |

लहरों सी उमंग,
लिए मुख हैं,
दिल दर्द है,
पैठ लिए गहराई,
चारो तरफ,
कोलाहल है,
यहाँ सिसकिया किसकी,
किसे दे सुनाई |

यू तो है,
भीड़ प्रचुर यहाँ,
मन मीत बिना,
छाई तन्हाई,
या रब,
इस बोझिल जीवन में,
मैं भोग रही,
तेरी निठुराई |

मेरे,
अव्यस्थित जीवन का,
व्यस्थित,
कोई छोर न देता दिखाई,
अब शेष बची,
कुछ यादें है,
हमसाथ मेरी,
बस है तन्हाई |

1 टिप्पणियाँ:

nidhi saxena ने कहा…

sab kuch to tha pas mere par...
fir bhi ek mein thi ek meri tanhai....
bahut sunadar sabodn ka sangam dard ko bhi khoosurat bana diya...

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