बुधवार, 31 मार्च 2010

दुर्लभ सुख


जिस दुर्लभ सुख के,
पाश बंधा,
वह देव,
धरा पर आता है,
माँ की ममतामय गोद में,
बैठा शिशु,
सहज वह पाता है |

जब - जब,
कोई अंतर्मन से,
प्रेम के,
सर्वोच्य रूप सपनाता है,
कोटि-स्वरूपा,
तब - तब ही,
माँ का स्वरुप धर आता है |

माँ के,
आँचल की छावँ तले,
सारा ब्रम्हाण्ड समाता है,
शिशु अबोध,
पर प्रेम-बोध,
स्वर्गिक सुख,
से न अघाता है |

माँ भी,
निःशब्द शिशु अंतर्मन,
पढने में,
चुक न पाती है,
लगा ह्रदय,
उस परमप्रिय पर,
स्नेह - सुधा बरसाती है |

माँ - शिशु का,
अद्भुत मेल,
अति - मनभावन,
छवि बनता है,
बस एक झलक,
जो मिल जाये,
हर मन हर्षित हों जाता है |

6 टिप्पणियाँ:

अक्षय-मन ने कहा…

माता और शिशु के आलौकिक प्रेम की परिभाषा इससे बेहतर कहीं और नहीं पढ़ी ..
अतिसुन्दर

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

maa ka prem..........vyakt nahi kiya ja sakta...bahut khubsurat rachna!!
kabhi yahan bhi aana
http://jindagikeerahen.blogspot.com/

रश्मि प्रभा... ने कहा…

maa ki mahima n jaye bakhani.......
ishwar ka dusra roop-maa

ρяєєтι ने कहा…

जब - जब,
कोई अंतर्मन से,
प्रेम के,
सर्वोच्य रूप सपनाता है,
कोटि-स्वरूपा,
तब - तब ही,
माँ का स्वरुप धर आता है ....
Waah... wese to Maa ka prem amulya, atulya hota hai...aapki yeh rachna bhi amulya, atulya rachna hai... bahut hi sundar...!

sujata ने कहा…

bahut hi achchi rachna hain sant ji....matritva prem ka bahut hi sundar chitran kiya hain aapne...aisi hi achchi achchi or bahvuk kavitaye likhte rahiye...

बेनामी ने कहा…

रेनू जैन ने कहा…

जब - जब,
कोई अंतर्मन से,
प्रेम के,
सर्वोच्य रूप सपनाता है,
कोटि-स्वरूपा,
तब - तब ही,
माँ का स्वरुप धर आता है |

बहुत बढ़िया संत जी... माँ के प्रेम को देव भी तरसते हैं। इस सर्वोच्च प्रेम को पाने की खातिर ही शिशु रूप धारण करते हैं....बहुत सुन्दर लिखा है |

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