शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

साथ मेरा



साथ मेरा,
जब है हमदम,
फिर साँझ - सवेरा क्या है ?
पग की बाधाएँ,
हैं क्या फिर ?
दुर्दांत अँधेरा क्या है ?

तुमने,
निज हाथ दिया मुझको,
हर पल का साथ दिया मुझको,
दुःख - सुख तेरे,
अब मेरे हैं,
तुमने कृतार्थ किया मुझको |

एक सफ़र के,
हम हमसफ़र बने,
अब धुप मिले या छाँव घने,
पग,
जहा पड़े मेरे राहों में,
तेरे, संग-पदचिन्हों की छाप बने |

होकर निःशंक,
तुम साथ चलो,
दे हाथों में तुम हाथ चलो,
मिल,
दुर्गम रस्ते साधें हम,
हर बाधाओं के पार चलो |

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर रचना .....सम्पूर्ण कविता ..प्रशंसनीय ...हर पंक्ति खुद में लाजवाब और कुछ कहती हुए .....एक सुन्दर पोस्ट के लिए बधाई स्वीकारे ..
    http://athaah.blogspot.com/

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  2. होकर निःशंक,
    तुम साथ चलो,
    दे हाथों में तुम हाथ चलो,
    मिल,
    दुर्गम रस्ते साधें हम,
    हर बाधाओं के पार चलो

    bahut bahut .....meethi kavita hai ...

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  3. waaah.... yahi to har vyakti chahta hai apne jeevan saathi main.....bahut hi sundar ...!

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  4. सुन्दर गीत । गुनगुनाने का गुण निहित है इसमे ।

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