रविवार, 25 अप्रैल 2010

बेपरवाह शहंशाह



जो,
आत्मतत्व,
को जान गए,
कब,
भव सागर,
में खोते है ?,
परवाह,
न जग की,
करते है,
बेपरवाह,
शहंशाह होते है |

जग,
जग के,
पीछे भाग रहा,
वो,
निज में,
ध्यान लगाते है,
जग,
जीत - जीत कर,
हार रहा,
वो,
हार के,
जीते जाते है |

जग ने,
देखे सम्राट घनै,
कुछ मिटे,
तभी,
कुछ नए बने,
ये बने,
तो फिर,
ना मिट पाए,
गर,
और बने,
तो भले बने |

बेपरवाह,
जहां से,
भले दिखें,
परवाह,
उसी की,
करते है,
जग,
निज में,
खोया रहता है,
वो जग में,
खोये रहते है |

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी कविता पढ कर दिन बन गया ।

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  2. जग,
    निज में,
    खोया रहता है,
    वो जग में,
    खोये रहते है |
    ...................
    बहुत खूब बंधू...
    शुभकामनायें..

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  3. sach me shahanshah............:)
    jinhone waqt ko jeet liya........bahut khubsurat!!
    kabhi yahan bhi dekhen
    mere jindagi ka canvess!!
    jindagikeerahen.blogspot.com

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  4. Rameshwar Gupta रामेश्वर गुप्ता3 मई 2010 को 11:09 am

    जय श्री कृष्ण ......मैं ही मैं बस??? .अहम् परमात्मा से मिलन में सबे बड़ा अवरोध हैं....जिस दिन हमने मैं से पीछा छुड़ा लिया हम उस से एकाकार हो जायेंगे...पर ये काम आसान होते हुए भी ना जाने क्यों हम कर नहीं पाते.... मैं ने क्या क्या नहीं करवाया.....भाई भाई आपस में लड़ते हैं अगर....आज हर कहीं हिंसा का माहोल हैं तो उसका सबसे बड़ा कारण ये मैं ही तो हैं....|

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