मंगलवार, 18 जनवरी 2011

तुम ईश्वर थे |



जब से
मैंने
तुमको जाना,
मन ही
मन में
अपना माना,
तन-मन
अर्पण
कर जाते हम,
तुमने
कब मुझको
पहचाना ?
तुम
ईश्वर थे,
क्यु तोड़
दिया,
तुमने मेरा
विश्वास अहो ?,
मैं दंश
झूठ के
सह लूँगी,
क्यु कर बैठे
आभिमान
कहो ?

तुम
टूट चुके थे,
तिरस्कार से,
तब
बाँह तुम्हारी
थामीं थी,
थी
शिकन न
उभरी
माथे पर,
तुममें,
दैव-जनित
कुछ खामी
थी |
क्यु छला
मेरे
अंतर्मन को,
दे दारुण
दुख
परिणाम अहो ?,
निर्मल
मन अर्पण
भूल गए,
क्यु कर
बैठे,
अपमान कहो ?

है याद,
व्यथित थे
तुम
भारी,
थे
चक्रबात के
घेरे में,
उर ज्योत
जलाई
थी मैंने,
थे
डूबे
कूप अँधेरे
में
क्यु
दिया मुझे,
फिर जीने को,
तम - जीवन
का
उपहार अहो ?
क्या यही
नेह का
प्रतिफल है ?
था यही
तुम्हे
स्वीकार कहो ?

तुम
अरमानो को
तोड़ चले,
मुझको
मजधार में
छोड़ चले
क्या खूब
निभाया
साथ मेरा,
यू गैरों सा
मुख
मोड़ चले,
हू
आज
व्यथित
मन से
भारी,
मैं
आज
स्वयं
से ही
हारी|

3 टिप्पणियाँ:

sada ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द

दिगम्बर नासवा ने कहा…

हू
आज
व्यथित
मन से
भारी,
मैं
आज
स्वयं
से ही
हारी|
बहुत दिल से कहा है ... एक आह सी निकली है ... लाजवाब ..

ehsas ने कहा…

जब से
मैंने
तुमको जाना,
मन ही
मन में
अपना माना,
तन-मन
अर्पण
कर जाते हम,
तुमने
कब मुझको
पहचाना ?

बेहतरीन रचना। आभार।

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