मंगलवार, 20 मई 2008

जीवन असार है

मरणासन्न,
किसी व्यक्ति की,
आँखों से देखो,
और सोचो,
जीवन,
ये कैसा व्यापार है ?

ध्वनि,
कई प्रतिध्वनियो में,
गूंजेगी तुम्हारे कानो में
जीवन असार है,
जीवन,
असार है |

ये स्वप्नों के पीछे,
दौड़ती जिंदगी,
ये सुख-दुःख के धुप-छाव से,
जूझती जिंदगी,
बचपन,
जवानी,
बुढापे में हरपल,
कुछ खोजती जिंदगी,
यू ही रीत जाती है,
उमरिया बीत जाती है |

अब जाने की है तैयारी,
टूटी भ्रम की झूठी खुमारी,
क्या खोया,
क्या पाया,
आकलन बड़ा पेचीदा है |

यू तो है,
एश्वर्य कदमो में,
तुने युग को जीता है,
पर क्या जा पायेगा साथ तेरे,
ये संसार मिथ्या है,
ये एश्वर्य झूठा है |

अब जाना,
जो जा सकता था,
उसे तो तुने संजोया ही नहीं,
अपने में खोया रहा,
दुखियों के दर्द पर,
तू कभी रोया ही नहीं |

तू हरपल लोभ,
ईर्ष्या,
अंहकार के बीज,
जीवन की गर्भ में बोता रहा,
अपनी हर जीत पर,
खुश होता रहा,
पर हर पल,
खुद को खोता रहा |

हाय काश,
जो ये आँखे,
पहले मिली होती,
तो आज,
तन्हाई में भी,
एक अलग ख़ुशी होती |

हरपल भीड़ में,
गुजारी थी जिंदगी मैंने,
आज इस तनहा सफर में,
कुछ तो रौशनी होती |

7 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा ने कहा…

बहुत ही भाव्प्रविन कविता,बहुत ही अच्छी.......

pallavi trivedi ने कहा…

bahut hi badhiya kavita....

श्रद्दा जैन ने कहा…

bahut hi moodh baat kahi hai aapne zindgi ki
ki jo hai paya wo kabhi sukh na de saka hamesha nahi pane ka dukh raha
aapki is kavita ke madhyam se zindgi ki sachhayi ko padhna achha laga

सतीश पंचम ने कहा…

अच्छी कविता है,नन्हे शिशु की तस्वीर भी अच्छी है।

ananya ने कहा…

आपने जीवन की असारता को अति सरलता एवं उत्कृष्टता से
पेश किया । रचना आकर्षक है । बधाई !

vandana ने कहा…

bahut achche...jivan ki yatharthta ko aapne bakhubi samjha hai........jo satya hai use hum dekhna nahi chahte aur asatya ke peeche sara jivan bahgte rahte hain..........ab bhi sambhal jayein to shayad kuch pa lein.....khud ko pana yahi insan ka sabse param dharm hai.

prakash_daruka ने कहा…

sahi hai bhaisaab!

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