बुधवार, 16 जून 2010

रिश्तों के रखाव में: प्रेम के रिश्ते को समर्पित



रिश्तों के
रखाव में
सहजता का
अभाव क्यों ?

अगाध
प्रेम था
राधा-कृष्ण
में,
सांसारिक
बन्धनों
से परे |

नैसर्गिक
प्रेम
बलवती
होता
गया,
हर क्षण,
लेकिन
अबधित
रही
उनकी
सांसारिक
कर्तव्यों
के प्रति
निष्ठा |

परन्तु
आज
इस रास्ते पर,
परिलक्षित
होता
भटकाव क्यों ?

रिश्तों के
रखाव में
सहजता का
अभाव क्यों ?

(नायेदा जी की काव्य श्रंखला से प्रभावित)

5 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

रिश्तों के
रखाव में
सहजता का
अभाव क्यों ?
aapsi samajh na ho, sneh naa ho to sahajta nahi hogi

पवन धीमान ने कहा…

बहुत अच्छी रचना

sada ने कहा…

बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

S.M.HABIB ने कहा…

barhiya kavita Sant bhai.

dr. nidhi saxena ने कहा…

रिश्तों के
रखाव में
सहजता का
अभाव क्यों ?..
abhav..sochne samjhen ki kshamta mein hai..
abavh ..jeewan jeene ki saflta mein hain..
abhav ...swabhav ki saralta mein hain...
abhav...bhavon ki bhawyata mein hai.....

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