सोमवार, 19 जुलाई 2010

उम्मीद



पथिक
राह पर
चले,
अथक,
मंजिल की
चाह
जरुरी है |

ठोकर खा
जीवन
संभल सके,
उम्मीद
की
बाँह
जरुरी है ||

दुःख-सुख
जीवन के
चिर-स्तम्भ,
क्रमबार
इन्हें
तो
आना है |

सृजन,
नाश
फिर सृजन,
प्रकृत का
निश्चित
स्वांग
पुराना है ||

ज्यू,
गहन
निशा के,
अन्धकार को,
दिवस
दिवाकर
खाता है |

त्यु जटिल
निराशा
मिटती है,
उर जब,
आशा के
दीप
जलाता है |

जग निर्माता
का
अटल
कर्म,
हर पल
उम्मीद
जगाता है |

एक बुझे,
कई
रौशन
हों,
कुछ यूँ,
जग को
जगमाता है | |

5 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari ने कहा…

वाह! बहुत उम्दा!

sada ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द ।

हास्यफुहार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

Parul ने कहा…

beautiful!

mridula pradhan ने कहा…

bahut achchi likhi.

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