सोमवार, 1 नवंबर 2010

जीत- हार



नैन
मूंद लेने से,
ज्योति,
निज का
अस्थित्व
कहाँ खोती है ?

तन के
हारे,
हार न
जब तक,
मन की
हार
नहीं होती है |

सत् की
राह पे
हरिश्चंद्र ने
राज,
देश,
कुटुंब- तन
हारा

पग - पग
हारे,
किन्तु,
परन्तु,
वचन
पूर्ति का लक्ष्य
न वारा |

हर क्षण
होती
दीन दशा
संग
अक्षय कीर्ति
सबल होती है

तन के
हारे,
हार न
जब तक,
मन की
हार
नहीं होती है |

आदर्श
की
रक्षा हेतु,
राम,
अवध छोड़
वन ओर सिधारे

क्या दुर्भाग्य
नहीं था
जो वे
साथ
सिया का
वन में हारे ?

भुज बल
प्रिय का
साथ मिला
जो
राज धर्म
हेतु फिर वारे

हर क्षण
होते
भाग्य - ग्रहण
संग
उनकी जयघोष
प्रवल
होती है |

तन के
हारे,
हार न
जब तक,
मन की
हार
नहीं होती है |

5 टिप्पणियाँ:

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही गहन चिंतन वाली पोस्ट...
गद्य को पूर्णता देती कविता भी सोचने को विवश करती है.

संजय भास्कर ने कहा…

तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.

श्रद्धा जैन ने कहा…

तन के
हारे,
हार न
जब तक,
मन की
हार
नहीं होती है |

bahut sateek baat hai .. bahut achchi kavita

sada ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

abhishek ने कहा…

bahut khub..sunder ..

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