रविवार, 26 अप्रैल 2009

चुनाव


जनतंत्र की है, जान ये,
धड़कन है, ये नेतागणों की,
यह शक्ति है, हर नागरिक की,
विधाता, राष्ट्र के जीवन मरण की

यह युद्ध है, मस्तक में उठती आंधियो की,
जो प्रबलतम, वेग से बहती हुई,यह बोलती है,
है हमें, इस राष्ट्र को, उचाईयो तक लेके जाना,
रास्तों के, कंटको को, है कुचल कर,पार पाना

है हमे, मंजिल पे जाकर, जीत का उद्घोष करना,
है हमें, इस राष्ट्र के, गौरव को, वापस छीन लाना
है हमें, अब यह दिखाना, है न हम सोये हुए,
तोड़ना है स्वप्न उनका, मद में जो खोये हुए

चुनना है अब हमें,जो योग्य हो, सक्षम भी हों,
राष्ट्र हित को, हों समर्पित, न्याय के संबल भी हों
हों समग्र प्रयास, घडी अब, आ चली उस कर्म की,
जीते वही,जिन कर सुरक्षित, ध्वज, न्याय की और धर्मं की

रविवार, 5 अप्रैल 2009

आलोचक संतुष्ट नहीं होते |


लाख जतन कर लिज्ये,
सुधा जल में ही भले धर दिज्ये,
नीम,
कड़वाहट नहीं खोते,
आलोचक
संतुष्ट नहीं होते |

ईश् ने,
जो ग्रीष्म की दी धूप,
आलोचकों के
मोम तन जलने लगे |

मेघ बरसाए,
जलन कुछ शांत हों,
जलमग्नता से,
त्राहि वे करने लगे |

दी शरद,
हों धुप ना जलमग्नता,
ठिठुरन बढ़ी,
तो ईश् भी अब क्या करें ?

दुर्मति की जड़ जमाई मैल,
मौसम भला कब धोते ?,
आलोचक
संतुष्ट नहीं होते |

आलोचना,
गर हों श्रृजन हेतु,
तो वो स्वीकार्य हों,

पथ-भ्रष्ट को,
गर राह दिखलाये,
तो वो शिरोधार्य हों,

आलोचना गर द्वेष दर्शाए,
तो तुम दिल की सुनो,
कुछ लोग
हरदम ही मिलेगे रोते,
आलोचक
संतुष्ट नहीं होते |

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

बचपन



चंचल, बोधरहित, मनभावन, 
सहज, सरल, मन ऊपवन,
स्वतः प्रेम जागृत कर जाये, 
कितना प्यारा बचपन |

रंच मात्र का लोभ नहीं, 
ना राग-द्वेष की बातें,
मस्ती का वह जीवन बीता, 
बाकी केवल यादें |

वो क्षण भर, मन का रूठना, 
अगले पल ही धूम मचाना,
जटिल बड़ा लगता अब सबकुछ, 
वो सामर्थ्य नहीं, पहचाना |

वो भूल कोई कर, डर, 
माँ के आँचल छिप जाना,
कितना साहस भर जाता था, 
वो स्नेह शरण का पाना |

बचपन की वो हंसी ठिठोली, 
ख्वाबों की मुक्त उडानें,
आज बंधा सा लगता जीवन, 
बचपन क्या, अब जानें |

काश यदि होता संभव, 
वक़्त को, उल्टे पैर चलाना,
जग जीवन से, राहत कितना, 
देता बचपन का आना |

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

प्रेम ईश्वर है …


ना आदि, ना अंत , इंद्रियो से परे जिसका स्तर है,
प्रेम, बड़ा अनमोल, प्रेम, शाक्षात ईश्वर है

प्रेम आत्मा के धरातल पर उफनता, भावों का असीम सागर है,
प्रेम अभाष्य, अदृश्य, आलोकिक ज्योति, कण-कण में जिसका घर है

प्रेम श्रृष्टि के उत्पत्ति की वजह, श्रृष्टि के पालन का आधार है,
प्रेम भावः को अलग करो गर, देखो, फिर मरघट यह संसार है

प्रेम आत्मा को, आत्मा से, परमात्मा से, जोड़ने का एकमात्र मार्ग है,
प्रेम बहुआयामी, बहुमूल्य है, यह है जहाँ, होता वही पर स्वर्ग है

बुधवार, 14 जनवरी 2009

पूर्णता


श्रृष्टि का हर कण ही होता, निज में है आधा-अधुरा
नेह वश जब आ मिले, हो पूर्णता का ख्वाब पूरा

रात्रि आधी, दिवस आधा, सोचो, है एक दूजे की बाधा
पूर्णता हेतु ही देखो, क्रमबद्धता में निज को बांधा

सम्पूर्णता निज में बने, यह होड़ अब चहु ओर है
क्या इस पनपती सोच का, कोई है धरा, कोई छोर है ?

क्या आज की यह सोच, अब शाश्वत नियम झुठ्लाएगी ?
या सामंजय्स से हीन हो, श्रृष्टि बिखर अब जायेगी ?

शनिवार, 27 दिसंबर 2008

समय बलवान होता है ..



तनिक सामर्थ्य पा, अक्सर बली अभिमान होता है,
मनुज, ठोकर लगे ना, दर्द से अनजान होता है
समय-निधि रेत पर, कितने घरौंधे रोज बन मिटते,
न जीता जा सका बन्धु, समय बलवान होता है


युगों पहले धारा पर वक़्त एक, दसशीश था आया,
गगन भी था प्रकंपित, अजेय जो सामर्थ्य था पाया
दशा विपरीत जब आई, न क्षण भर भी वो टिक पाया,
बुरे कर्मो का तो भरना, बुरा परिणाम होता है,
न जीता जा सका ........


वक़्त ने ली नयी करवट, अहम् का बीज फिर फूटा,
सुत प्रेमवद्ध एक भूप ने, निज भ्रात हित लूटा
शत-पुत्र, सारे मर मिटे, नहीं विष बेल फल पाया,
अतिक्रमण अधिकार का हो जब, यही अंजाम होता है,
न जीता जा सका ............


काल पश्चिम का फिर आया, व्योम सा जग पे जो छाया,
न क्षण-भर को मिली राहत, दिवाकर भी था घबराया
अहम् के श्रृंग से टूटा यू, धारा पर निज सिमट आया,
यहाँ तो हर उदय का, निश्चित कभी अवसान होता है,
न जीता जा सका ............

शनिवार, 29 नवंबर 2008

अंतरघात

राष्ट्र की अखंडता,
नित हो रही आहात,
दुश्मन बड़ा शातिर, लगा जाता नए आघात
मुश्किल बड़ा उनको निपटना, दिखती नहीं वो बात
है चोट दे जाती जो, है अपनों का अंतरघात

अक्सर कोई शत्रु, राष्ट्र के आँगन में घुस आता है,
निश्चय ही कही सीमा प्रहरी, ईमान बेच कर खाता है
आँगन में आकर भी वो भला, क्यु पहचाना नहीं जाता है ?
आपना ही कोई रक्षक बनता, वह शरणागत हो जाता है

फिर धीरे धीरे वह घर के, भेदी की टोह लगाता है,
दुर्भाग्य बड़ा, वह अपनों में, दुश्मन की फौज बनता है
फिर समय देखकर, अपने ही अपनों का लहू बहाते है,
दुश्मन, बैठा दूर सुरक्षित, मुस्काते, ईठलाते है

अब मासूमों की चिता-राख से, जमकर होली चलती है,
अफ़सोस इन्ही घटनाक्रम में, अब राजनीत जो पलती है
दुश्मन कायर, हम सबल, नहीं मंशा पूरी होने देंगे,
मीठा लगता यह गान, चलो एक बार और फिर सुन लेंगे

है समय नहीं निज कायरता, का दोष और पर मढ़ने का
है वक़्त बीच आपनो के बनी खाई को भरने का
गर हुए एक, फिर शत्रु की, घृणित हर मुहीम बिफल होगी,
आतंक मिटेगा जन जन से, उन्नति की चाह सफल होगी