शुक्रवार, 22 अगस्त 2008

यह है परीक्षा की घडी |

घोर छाया हो अँधेरा, 
चुभती हो 
शूलों सी राहें,
रूह भी 
जब थक चुकी हो, 
मुश्किलें फैलाती बाहें |

कुछ नहीं आता 
समझ में, 
सुन ये पथिक 
तुम ध्यान देना,
यह है परीक्षा की घडी, 
कुछ धैर्य से 
तुम काम लेना ||

शनिवार, 26 जुलाई 2008

प्रेम समर्पण खोजता है |

धन की चाहत 
हो यदि, 
खुशियों का 
अर्पण खोजता है,
तन की चाहत 
हो यदि, 
विषयों भरा 
मन खोजता है,
गर हो चाहत 
प्रेम की, 
वह भी मिलेगा 
इस जहाँ में,
बस एक निर्मल 
और निश्चल, 
मन का 
समर्पण खोजता है |

प्रेम जीता जा 
सका कब, 
रणक्षेत्र में 
कौशल दिखा कर ?
प्रेम जीता जा 
सका कब, 
छल से भरी 
चौसर बिछाकर ?
गर जीतना है 
प्रेम को, 
वह जीत पाओगे 
जहाँ में
मद से भरा 
बस एक ह्रदय का, 
हार जाना खोजता है |

प्रेम देखा जा सका कब, 
मस्जिदों, देवालयों में ?
प्रेम देखा जा सका कब, 
गिरिजाघरों, शिवालयों में ?
गर देखना है 
प्रेम को, 
वह देख पाओगे 
जहाँ में
बस नेह्प्लवित 
दो नयन में, 
डूब जाना खोजता है |

प्रेममय गर हो, 
जहां को जो बनाना,
नेह सुमन दिल में, 
खिलाना खोजता है,
मद, लोभ, ईर्ष्या, 
द्वेष की गठरी धरा से,
कही दूर, 
दरिया में बहाना खोजता है |

सोमवार, 14 जुलाई 2008

जो जैसा बोता है …..

ईश्वर कब सुख-दुःख, 
अपने बच्चों में बाटता है,
जो जैसा बोता है, 
वैसा ही काटता है |

देखो प्रकृति 
खेल कैसे खेलती है,
बीज जब तक कंटको का, 
बन जाये ना वृक्ष,
पालती है, 
पोसती, 
सब झेलती है |

बोने वाले का 
अहम् भी फूलता है,
वो लगा आसन, 
तले उस वृक्ष के
नैन मूंदे मद-हिडोले 
झूलता है |

सोचता है 
अब लगेंगे फल रसीले,
कंटको में कब लगेंगे 
फल रसीले ?
हाथ आता है तो बस, 
झाड़ें कटीले |

अब वह करुण क्रंदन से 
नभ को भेदता है,
प्रश्न-शर से, 
ईश ऊर को छेदता है,
दर्द ऐसा क्यों दिया, 
कुछ बोल अब तो,
तू कहा बैठा है, 
गुत्थी खोल अब तो |

ईश बोले, 
हूँ न दोषी मैं किसी का,
कुछ बो सके, 
यह वक़्त आता है सभी का,
इस धरा पर 
कर्म का ही चक्र चलता
जैसा जो बोता, 
ठीक वैसा ही है फलता |

आज तुझको जो मिला, 
तेरे कर्मो का फल है,
कांटे थे बोए, 
फिर चुभन से क्यों विकल है,
कर्म पीछा छोड़ता है 
कब किसी का ?
वक़्त करता न्याय, 
एक दिन है सभी का |

मंगलवार, 20 मई 2008

जीवन असार है |

मरणासन्न,
किसी व्यक्ति की,
आँखों से देखो,
और सोचो,
जीवन,
ये कैसा व्यापार है ?

ध्वनि,
कई प्रतिध्वनियो में,
गूंजेगी तुम्हारे कानो में
जीवन असार है,
जीवन
असार है |

ये स्वप्नों के पीछे,
दौड़ती जिंदगी,
सुख-दुःख के धुप-छाव से,
जूझती जिंदगी,
बचपन,
जवानी,
बुढापे में हरपल,
कुछ खोजती जिंदगी,
यूँ ही रीत जाती है,
उमरिया बीत जाती है |

अब जाने की है तैयारी,
टूटी भ्रम की झूठी खुमारी,
क्या खोया, क्या पाया,
आकलन बड़ा पेचीदा है |

यू तो है
एश्वर्य कदमो में,
तुने युग को जीता है,
पर क्या जा पायेगा साथ तेरे ?
ये संसार मिथ्या है,
ये एश्वर्य झूठा है |

अब जाना,
जो जा सकता था,
उसे तो तुने संजोया ही नहीं,
अपने में खोया रहा,
दुखियों के दर्द पर,
तू कभी रोया ही नहीं |

तू हरपल लोभ,
ईर्ष्या,
अंहकार के बीज,
जीवन के गर्भ में बोता रहा,
अपनी हर जीत पर,
खुश होता रहा,
पर हर पल,
खुद को खोता रहा |

काश,
जो ये आँखे,
पहले मिली होती,
तो आज,
तन्हाई में भी,
एक अलग ख़ुशी होती |

हरपल भीड़ में,
गुजारी थी जिंदगी मैंने,
आज इस तन्हा सफर में,
कुछ तो रौशनी होती |

रविवार, 20 अप्रैल 2008

विश्वास न खोने देना |



हो थकान भरी 
जीवन की डगर, 
तुम आस न सोने देना
बरसेंगे ख़ुशी के मेघ, 
ये तुम विश्वास न खोने देना |

जितना पतझड़ है सत्य, 
वसंत की 
उतनी ही सच्चाई है,
दो दिवस के 
मध्य में हीं हरदम, 
कोई रात घनी आयी है
कब दिल की अगन, 
रोके है पवन, 
तुम चाह ना बुझने देना,
है ताकत तो 
झुकता है गगन, 
तुम बाह ना झुकने देना |

सतयुग हो या हो कलयुग, 
है सत्य दिखा परेशां,
सहमा, विचला राहों में, 
थी सफर न उसकी आसां,
पर जीता है वो हरदम, 
तुम हार न होने देना,
मंजिल है तुम्हारी निश्चित, 
बस राह न खोने देना |

मन हार न माने जब तक, 
है आस विजय की तब तक,
जब प्रेम प्रबल हो जाता, 
कब रोके कौन विधाता ?

सौ आस जो टूटे दिल के, 
फिर स्वप्न संजोने देना,
हाँ ख्वाब है होते पूरे, 
ये विश्वास न खोने देना |

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2008

आस्था

ना ज्ञान जिसको छू सके, 
ना अर्थ जिसको तौल पाती,
बस प्रेम के घृत से ही जलती, 
आस्था की दिव्य बाती |

जब समस्त ब्रह्मण्ड की है, 
राज सत्ता हार जाती,
तम घना इतना, 
ना ज्योति दूर तक है दीख पाती,
आस्था आदित्य बन तब, 
विकल मन नभ पर है छाती,
फिर कहाँ ठहरे अमावस, 
रश्मि प्रभा ही जगमगाती |

इस चराचर विश्व को, 
है आस्था ही है चलाती,
विज्ञान की छोटी परिधि, 
कब कहाँ इसको है पाती ?
आस्था वो शक्ति है, 
जो बिधि के नियम फिर से सजाती,
आस्था वो तेज है, 
जो हरि को भी संन्मुख खीच लाती |

तब राम बड़े या फिर रहीम, 
यह सोच क्यों उलझन बढाती ?
आस्था है सर्वसत्ता, 
मन मूढ़ क्यों ना मान पाती |

रविवार, 2 मार्च 2008

क्षेत्रीयता



क्यों बिखरती जा रही है रोज कड़ियाँ, 
एकता, विश्वास और आत्त्मियता की ?
हैं कौन वो, 
जो बो रहे हैं शूल, 
राष्ट्र के सीने में, क्षेत्रीयता की ?

जनतंत्र का यह गर्व भारत, 
सदियों से बैरी रहा 
जिसका जमाना
हैं शान से कहते रहे हम, 
कुछ बात है हममे, 
जो मिटता है नहीं ये आशियाना,
क्या बात है हममें, 
सिवाए एकता, विश्वास 
और अत्त्मियता के ?
क्या बात है हममें, 
सिवाए संस्कृति, सिद्धांत 
और राष्ट्रीयता के ?

है विश्वास अपना 
की अतिथि देव होते है, 
है विश्वास अपना, 
की परहित धर्मं होता है,
है विश्वास आपना 
की एकता में शक्ति होती है, 
है विश्वास आपना की 
सर्वधर्म सम्मान ही सच्ची भक्ति होती है |

यह विश्वास ही तो है, 
जिसके सामने 
दिग्गजों के भी 
मनोबल टूट जाते है,
यह शक्ति ही तो है, 
जिसके सामने 
शत्रु हार जाते है, 
दुश्मनों के पसीने छुट जाते है |

फिर कौन हैं वो, 
जो सदियों से संचित 
इस शक्ति को, 
नष्ट करने पर तुले है ?
फिर कौन है वो 
जो भटक गए है, 
मंजिल की राह भूले है ?

क्या हम चुपचाप बैठे देखते रहेंगे, 
उनकी गुस्ताखियों को
या बढेंगे कुछ हाथ, 
उनको रोकने को, 
समझाने को, 
राह दिखने को |

कहीं देर ना हो जाए 
की राही भटक जाएं, 
रास्ता दिखाना शेष ना रहे,
कहीं देर ना हो जाए
की मंजिल खो जाए, 
फिर शायद इस राष्ट्र को 
बचाना शेष ना रहे |