शनिवार, 23 जनवरी 2010

तुम हों, तो जग है |


सच कहता हूँ,
गर मानो तुम,
उद्दगार-हिय,
पहचानो तुम,
तेरी नेहामृत का आसक्त,
हुआ रग - रग है,
तुम हों, तो जग है |

यू तो,
फूलो का खिलना,
बहुत पुराना है,
मधु-ऋतू का आना,
भी जाना पहचाना है |
तुम आये,
समय वही,
पर सबकुछ बदल गया,
आज,
मैं देखू जिधर,
दिखे जगमग है |
तुम हों .... |

सुख-दुःख का,
साथ तभी से,
जब से समझ बढ़ी,
जीने के क्रम में,
भेट अगिनत स्वप्न चढ़ीं |
तुम मिले,
स्वप्न आखों में,
फिर है उमड़ गए,
आज,
भरा विश्वास,
बढे हर पग है |
तुम हों ..... |

था सुना,
प्रेम अनमोल,
जगत में होता,
अनभिज्ञ रहा,
था कहीं भाग्य छिप सोता |
सानिध्य तुम्हारा,
सोता भाग्य,
है जगा गया,
अब,
आनंद गगन में,
झूमे ह्रदय विहंग है |
तुम हों ...... |

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

कुछ सपने



नियति प्रधान,
जग जीवन के,
कुछ हिस्से,
कब पूरे हों पाते है ?
कुछ सपने,
अधूरे रह जाते है |

स्वप्न देखा,
अवधपति ने,
ज्येष्ठ सुत राजा बने,
प्रारब्ध के आगे,
मनुज सुख-स्वप्न,
कब जाते गणे ?
सुत चला वनवास,
वियोग,
क्षण प्राण हर जाते है,
कुछ सपने ..... |

स्वप्न देखा,
नवबधु सिया ने,
गृहस्थी सुखकारी बने,
भावी बनी दीवार,
मिली हर राह,
वह घेरी खड़े,
प्रथम मिला बनवास,
हरण,
कुछ ले गया विश्वास,
प्रिय-कर त्याग,
बचा सब कुछ बहा जाते है,
कुछ सपने ..... |

मंगलवार, 29 सितंबर 2009

मातृभाषा


मातृभाषा,
सूचक होती है,
आत्मविश्वास का,
स्व-सम्मान का,
निज-गौरव का,
बिलकुल माँ की तरह,
व्यक्तता की परिधि से, कही ऊपर |

मातृभाषा,
माँ की ही भाँति,
बूढी हों सकती है,
कुरूप भी हों सकती है,
हों सकती है जर्जर,
परन्तु माँ, माँ होती है,
हर हाल, हर भेष में, पूज्य |

और जब, देववाणी,
हों जिसका उत्पत्ति श्रोत,
समृद्ध अतीत की, चमक जिसकी,
सक्षम है, आज भी,
कर सकने में विदीर्ण,
क्षद्म प्रबुद्धता का तमाभिमान |

फिर क्यूकर वह हिंदी,
अपने ही राष्ट्र में,
खोती जा रही,
अपना आत्मगौरव ?,
अपनी पहचान ?,
अपना स्वाभिमान ? |

क्या यह घोतक नहीं,
हमारी विस्मृत समृद्धि का ?,
क्षीर्ण आत्मबल का ?,
अदूरदर्शिता का ?,
अकर्मण्यता का ?,
दासत्व से प्रेरित मानसिकता का ? |

और हम है,
जो न जागने की,
भीष्म-प्रतिज्ञा से ग्रसित,
अपने ही देश में, अपनी ही भाषा का,
कर एक दिवस मुकरर, जोह रहें है बाट,
किसी अनदेखे, अनजाने चमत्कार का |

क्या हम,
समय रहते, जाग पाएंगे ?
अपने स्वर्णिम अतीत के प्रति,
निज में, प्रेम जगा पाएंगे ?
या बैठ गोद में, पर-माता की,
अपनी ही दुर्गति का, जश्न मनाएंगे ?

सोमवार, 21 सितंबर 2009

हार - जीत, सब भ्रम है |



हर पल जीवन दूर सरकता, खूब श्रृष्टि का क्रम है |
क्या खोना, क्या पाना, हार - जीत, सब भ्रम है ||

आपाधापी में जीवन की, नर दूर निकाल जाता है |
अंतकाल, था चला, स्वयं को, खड़ा वही पाता है ||

बन इच्छाओ का दास मनुज, जग में मारा फिरता है |
एक हों पूरी,वह फिर-फिर, सौ इच्छाओ से घिरता है ||

क्षणिक ज्ञान,यश,धन,बल पा, नर व्यर्थ ही, इतराता है |
मिट्टी का तन, नश्वर जीवन, मिटना है, मिट जाता है ||

मृगतृष्णा है जग का सुकून, कब मिलता ?, कब खोता है ?|
माया के, हों वशीभूत मनुज, क्षण हँसता, क्षण रोता है ||

रविवार, 28 जून 2009

मेघ मेरे


तपती धरती, गगन धधकता,
त्राहि दसों दिशायें है,
मेघ मेरे, तुम कहाँ हों अटके,
आश-नयन पथराये हैं |

नेह-चमन, तुम बिन है सूना,
मन-पुष्प, शिथिल, मुरझाये है,
चिर- कालो से, तुमने ही तो,
प्रेम सुधा बरसाए है |
मेघ मेरे, तू कहाँ ...... |

प्रेयसी बैठी इंतजार में,
प्रीतम अभी न आये है,
तुम, पहुचाते थे, प्रीत-निमंत्रण,
पहुच नहीं, जो पाए है |
मेघ मेरे, तू कहाँ ...... |

तुम बिन, जग का काज अधुरा,
ज्यूँ साज बिना, आवाज अधुरा,
कृषकों के, सूखे कंठ कभी से,
तेरी अरदास लगाये है |
मेघ मेरे, तू कहाँ ...... |

पतित भी तेरी राह निहारें,
ठहरे तुम,उनको जो प्यारे,
जग-उपहासों से दग्ध ह्रदय संघ
कब किसने, अश्रु बहाए है |
मेघ मेरे, तू कहाँ ...... |

अब आ जाओ, तूम छा जाओ,
घनघोर पियूष, बरसा जाओ,
जग के तृष्णारत अधरों की,
अब त्वरित प्यास बुझा जाओ |

रविवार, 10 मई 2009

सेवा ब्रत, शूल का पथ है |


सेज नहीं है,
यह फूलो की,
नहीं,
समृद्धि का रथ है,
आग्नि क्षेत्र से,
पड़े गुजरना,
सेवा ब्रत,
शूल का पथ है |

जब नर,
निज हितलाभ द्वंद से,
ऊपर उठ जाता है,
सकल लोक कल्याण हेतु,
उर,
ज्योति जला पाता है |

जब कोई नयन,
सहज ही,
और के,
दर्द बहा जाता है,
जन समुद्र में,
फिर कही,
कोई,
मोती उभर पाता है |

जटिल बड़ी यह राह,
गृहस्थ हों,
हों छद्म वैरागी,
चल पाते है,
इस पथ को जो,
होते है,
वे बडभागी |

रविवार, 26 अप्रैल 2009

चुनाव


जनतंत्र की है, जान ये,
धड़कन है, ये नेतागणों की,
यह शक्ति है, हर नागरिक की,
विधाता, राष्ट्र के जीवन मरण की

यह युद्ध है, मस्तक में उठती आंधियो की,
जो प्रबलतम, वेग से बहती हुई,यह बोलती है,
है हमें, इस राष्ट्र को, उचाईयो तक लेके जाना,
रास्तों के, कंटको को, है कुचल कर,पार पाना

है हमे, मंजिल पे जाकर, जीत का उद्घोष करना,
है हमें, इस राष्ट्र के, गौरव को, वापस छीन लाना
है हमें, अब यह दिखाना, है न हम सोये हुए,
तोड़ना है स्वप्न उनका, मद में जो खोये हुए

चुनना है अब हमें,जो योग्य हो, सक्षम भी हों,
राष्ट्र हित को, हों समर्पित, न्याय के संबल भी हों
हों समग्र प्रयास, घडी अब, आ चली उस कर्म की,
जीते वही,जिन कर सुरक्षित, ध्वज, न्याय की और धर्मं की