सोमवार, 19 जुलाई 2010

उम्मीद



पथिक
राह पर
चले,
अथक,
मंजिल की
चाह
जरुरी है |

ठोकर खा
जीवन
संभल सके,
उम्मीद
की
बाँह
जरुरी है ||

दुःख-सुख
जीवन के
चिर-स्तम्भ,
क्रमबार
इन्हें
तो
आना है |

सृजन,
नाश
फिर सृजन,
प्रकृत का
निश्चित
स्वांग
पुराना है ||

ज्यू,
गहन
निशा के,
अन्धकार को,
दिवस
दिवाकर
खाता है |

त्यु जटिल
निराशा
मिटती है,
उर जब,
आशा के
दीप
जलाता है |

जग निर्माता
का
अटल
कर्म,
हर पल
उम्मीद
जगाता है |

एक बुझे,
कई
रौशन
हों,
कुछ यूँ,
जग को
जगमाता है | |

बुधवार, 16 जून 2010

रिश्तों के रखाव में: प्रेम के रिश्ते को समर्पित



रिश्तों के
रखाव में
सहजता का
अभाव क्यों ?

अगाध
प्रेम था
राधा-कृष्ण
में,
सांसारिक
बन्धनों
से परे |

नैसर्गिक
प्रेम
बलवती
होता
गया,
हर क्षण,
लेकिन
अबधित
रही
उनकी
सांसारिक
कर्तव्यों
के प्रति
निष्ठा |

परन्तु
आज
इस रास्ते पर,
परिलक्षित
होता
भटकाव क्यों ?

रिश्तों के
रखाव में
सहजता का
अभाव क्यों ?

(नायेदा जी की काव्य श्रंखला से प्रभावित)

गुरुवार, 3 जून 2010

रिश्तों के रखाव में : पति-पत्नी के रिश्ते को समर्पित



रिश्तों के
रखाव में
सहजता का
अभाव क्यों ?

अटूट
रहा
एक - दूजे
के प्रति
राम-सीता
का
प्रेम,
विश्वास,
समर्पण |

वक़्त की
आंधियाँ
हारती
गयी,
निखारती
गयी,
उनके
चिर-स्थाई
व्यवहार
को,
वनवास,
हरण,
त्याग
की
कसौटियों
पर
कस - कस
कर,

परन्तु
आज
इन रिश्तों में,
अल्प मुद्दों
पर ही,
उमड़ पड़ता
बिखराव क्यों ?

रिश्तों के
रखाव में
सहजता का
अभाव क्यों ?

(नायेदा जी की काव्य श्रंखला से प्रभावित)

रविवार, 2 मई 2010

रिश्तों के रखाव में: मित्र के प्रति कृतज्ञता



रिश्तों के
रखाव में
सहजता का
अभाव क्यों ?

नहीं
छोड़ा था
साथ
कर्ण ने,
मित्र का,
धर्मयुद्ध में |

अधर्म का
साथ,
भाई का
विरोध,
हस्तिनापुर की
राजसत्ता,
यहाँ तक की
कृष्ण का
उपदेशपूर्ण
सुझाब
सब
बौना
पर गया
भारी पड़ी
मित्र
के प्रति
कृतज्ञता

मगर
हमारी सोचों में
बसता
मित्रता
में भी
हिसाब किताब क्यों ?

रिश्तों के
रखाव में
सहजता का
अभाव क्यों ?

(नायेदा जी की प्रेरणा से)

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

साथ मेरा



साथ मेरा,
जब है हमदम,
फिर साँझ - सवेरा क्या है ?
पग की बाधाएँ,
हैं क्या फिर ?
दुर्दांत अँधेरा क्या है ?

तुमने,
निज हाथ दिया मुझको,
हर पल का साथ दिया मुझको,
दुःख - सुख तेरे,
अब मेरे हैं,
तुमने कृतार्थ किया मुझको |

एक सफ़र के,
हम हमसफ़र बने,
अब धुप मिले या छाँव घने,
पग,
जहा पड़े मेरे राहों में,
तेरे, संग-पदचिन्हों की छाप बने |

होकर निःशंक,
तुम साथ चलो,
दे हाथों में तुम हाथ चलो,
मिल,
दुर्गम रस्ते साधें हम,
हर बाधाओं के पार चलो |

रविवार, 25 अप्रैल 2010

बेपरवाह शहंशाह



जो आत्मतत्व को 
जान गए,
कब भव सागर में 
खोते है ?
परवाह न जग की
करते है,
बेपरवाह 
शहंशाह होते है |

जग,
जग के
पीछे भाग रहा,
वो निज में,
ध्यान लगाते है,
जग,
जीत-जीत कर
हार रहा,
वो,
हार के
जीते जाते है |

जग ने,
देखे सम्राट घणै,
जो समय चक्र से,
धूल बने,
ये बने,
तो फिर,
ना मिट पाए,
ख़म ठोक,
हिमपति तुल्य जमे |

बेपरवाह,
जहां से,
भले दिखें,
परवाह,
उसी की करते है,
जग,
निज में खोया रहता है,
वो जग में,
खोये रहते है |

बुधवार, 31 मार्च 2010

दुर्लभ सुख


जिस दुर्लभ सुख के,
पाश बंधा,
वह देव,
धरा पर आता है,
माँ की ममतामय गोद में,
बैठा शिशु,
सहज वह पाता है |

जब - जब,
कोई अंतर्मन से,
प्रेम के,
सर्वोच्य रूप सपनाता है,
कोटि-स्वरूपा,
तब - तब ही,
माँ का स्वरुप धर आता है |

माँ के,
आँचल की छावँ तले,
सारा ब्रम्हाण्ड समाता है,
शिशु अबोध,
पर प्रेम-बोध,
स्वर्गिक सुख,
से न अघाता है |

माँ भी,
निःशब्द शिशु अंतर्मन,
पढने में,
चुक न पाती है,
लगा ह्रदय,
उस परमप्रिय पर,
स्नेह - सुधा बरसाती है |

माँ - शिशु का,
अद्भुत मेल,
अति - मनभावन,
छवि बनता है,
बस एक झलक,
जो मिल जाये,
हर मन हर्षित हों जाता है |