शनिवार, 27 दिसंबर 2008

समय बलवान होता है ..



तनिक सामर्थ्य पा, अक्सर बली अभिमान होता है,
मनुज, ठोकर लगे ना, दर्द से अनजान होता है
समय-निधि रेत पर, कितने घरौंधे रोज बन मिटते,
न जीता जा सका बन्धु, समय बलवान होता है


युगों पहले धारा पर वक़्त एक, दसशीश था आया,
गगन भी था प्रकंपित, अजेय जो सामर्थ्य था पाया
दशा विपरीत जब आई, न क्षण भर भी वो टिक पाया,
बुरे कर्मो का तो भरना, बुरा परिणाम होता है,
न जीता जा सका ........


वक़्त ने ली नयी करवट, अहम् का बीज फिर फूटा,
सुत प्रेमवद्ध एक भूप ने, निज भ्रात हित लूटा
शत-पुत्र, सारे मर मिटे, नहीं विष बेल फल पाया,
अतिक्रमण अधिकार का हो जब, यही अंजाम होता है,
न जीता जा सका ............


काल पश्चिम का फिर आया, व्योम सा जग पे जो छाया,
न क्षण-भर को मिली राहत, दिवाकर भी था घबराया
अहम् के श्रृंग से टूटा यू, धारा पर निज सिमट आया,
यहाँ तो हर उदय का, निश्चित कभी अवसान होता है,
न जीता जा सका ............

शनिवार, 29 नवंबर 2008

अंतरघात

राष्ट्र की अखंडता,
नित हो रही आहात,
दुश्मन बड़ा शातिर, लगा जाता नए आघात
मुश्किल बड़ा उनको निपटना, दिखती नहीं वो बात
है चोट दे जाती जो, है अपनों का अंतरघात

अक्सर कोई शत्रु, राष्ट्र के आँगन में घुस आता है,
निश्चय ही कही सीमा प्रहरी, ईमान बेच कर खाता है
आँगन में आकर भी वो भला, क्यु पहचाना नहीं जाता है ?
आपना ही कोई रक्षक बनता, वह शरणागत हो जाता है

फिर धीरे धीरे वह घर के, भेदी की टोह लगाता है,
दुर्भाग्य बड़ा, वह अपनों में, दुश्मन की फौज बनता है
फिर समय देखकर, अपने ही अपनों का लहू बहाते है,
दुश्मन, बैठा दूर सुरक्षित, मुस्काते, ईठलाते है

अब मासूमों की चिता-राख से, जमकर होली चलती है,
अफ़सोस इन्ही घटनाक्रम में, अब राजनीत जो पलती है
दुश्मन कायर, हम सबल, नहीं मंशा पूरी होने देंगे,
मीठा लगता यह गान, चलो एक बार और फिर सुन लेंगे

है समय नहीं निज कायरता, का दोष और पर मढ़ने का
है वक़्त बीच आपनो के बनी खाई को भरने का
गर हुए एक, फिर शत्रु की, घृणित हर मुहीम बिफल होगी,
आतंक मिटेगा जन जन से, उन्नति की चाह सफल होगी

मंगलवार, 2 सितंबर 2008

गो रक्षण

थकते न हम जिस हिंद का
करते हुए गुणगान है,
कहते हमारी सभ्यता, 
जग श्रेष्ट है, 
महान है,
पर पालती निज रक्त जो, 
रखते न 
उसका मान है,
हर चौक पर है गौ बलि, 
किस राष्ट्र का अभिमान है ?

हम जगे,
हमने दिखाया विश्व को 
रौशन जहाँ,
पालनेवाली यशोदा, 
कब माँ कही जाती कहाँ ?
गौ को भी हमने था दिया, 
जननी का दर्जा ही यहाँ
अफ़सोस अब है खो गए, 
जज़्बात वो जाने कहाँ |

आलम ये है,
अब राष्ट्र का, 
छूटा न कोई प्रान्त है,
जहाँ गौ बलि चढ़ती नहीं, 
धिक्कार है हम शांत है,
बध के लिए खूटे बंधी, 
वो मूक हमको निहारती,
पीडा के अश्रु झरे नयन, 
मृत्यु निकट वह ताड़ती |

है सोचती,
पाला जिसे अमृत पिला,
वे आज मुझ सम विष-निवाले धर चले,
जीवन के एक - एक मोड पर जिनको संभाला,
हाय, आज मुझको यम् हवाले कर चले,
सर्वश्व नेयोछाबर किया, जी भर लुटाई सम्पदा,
क्या था नहीं अधिकार मेरा, निर्भय जियू जग में सदा ?

उपकार उनका है बहुत इस देह पर,
हक़ है बड़ा उनका हमारे नेह पर
अधिकार उनको यह मिले, अब यत्न मिलकर हम करे
यह धर्मं की निरपेक्षता का ढोंग,
भला, वो निरीह क्यु सहते रहे

शुक्रवार, 22 अगस्त 2008

यह है परीक्षा की घडी |

घोर छाया हो अँधेरा, 
चुभती हो 
शूलों सी राहें,
रूह भी 
जब थक चुकी हो, 
मुश्किलें फैलाती बाहें |

कुछ नहीं आता 
समझ में, 
सुन ये पथिक 
तुम ध्यान देना,
यह है परीक्षा की घडी, 
कुछ धैर्य से 
तुम काम लेना ||

शनिवार, 26 जुलाई 2008

प्रेम समर्पण खोजता है |

धन की चाहत 
हो यदि, 
खुशियों का 
अर्पण खोजता है,
तन की चाहत 
हो यदि, 
विषयों भरा 
मन खोजता है,
गर हो चाहत 
प्रेम की, 
वह भी मिलेगा 
इस जहाँ में,
बस एक निर्मल 
और निश्चल, 
मन का 
समर्पण खोजता है |

प्रेम जीता जा 
सका कब, 
रणक्षेत्र में 
कौशल दिखा कर ?
प्रेम जीता जा 
सका कब, 
छल से भरी 
चौसर बिछाकर ?
गर जीतना है 
प्रेम को, 
वह जीत पाओगे 
जहाँ में
मद से भरा 
बस एक ह्रदय का, 
हार जाना खोजता है |

प्रेम देखा जा सका कब, 
मस्जिदों, देवालयों में ?
प्रेम देखा जा सका कब, 
गिरिजाघरों, शिवालयों में ?
गर देखना है 
प्रेम को, 
वह देख पाओगे 
जहाँ में
बस नेह्प्लवित 
दो नयन में, 
डूब जाना खोजता है |

प्रेममय गर हो, 
जहां को जो बनाना,
नेह सुमन दिल में, 
खिलाना खोजता है,
मद, लोभ, ईर्ष्या, 
द्वेष की गठरी धरा से,
कही दूर, 
दरिया में बहाना खोजता है |

सोमवार, 14 जुलाई 2008

जो जैसा बोता है …..

ईश्वर कब सुख-दुःख, 
अपने बच्चों में बाटता है,
जो जैसा बोता है, 
वैसा ही काटता है |

देखो प्रकृति 
खेल कैसे खेलती है,
बीज जब तक कंटको का, 
बन जाये ना वृक्ष,
पालती है, 
पोसती, 
सब झेलती है |

बोने वाले का 
अहम् भी फूलता है,
वो लगा आसन, 
तले उस वृक्ष के
नैन मूंदे मद-हिडोले 
झूलता है |

सोचता है 
अब लगेंगे फल रसीले,
कंटको में कब लगेंगे 
फल रसीले ?
हाथ आता है तो बस, 
झाड़ें कटीले |

अब वह करुण क्रंदन से 
नभ को भेदता है,
प्रश्न-शर से, 
ईश ऊर को छेदता है,
दर्द ऐसा क्यों दिया, 
कुछ बोल अब तो,
तू कहा बैठा है, 
गुत्थी खोल अब तो |

ईश बोले, 
हूँ न दोषी मैं किसी का,
कुछ बो सके, 
यह वक़्त आता है सभी का,
इस धरा पर 
कर्म का ही चक्र चलता
जैसा जो बोता, 
ठीक वैसा ही है फलता |

आज तुझको जो मिला, 
तेरे कर्मो का फल है,
कांटे थे बोए, 
फिर चुभन से क्यों विकल है,
कर्म पीछा छोड़ता है 
कब किसी का ?
वक़्त करता न्याय, 
एक दिन है सभी का |

मंगलवार, 20 मई 2008

जीवन असार है |

मरणासन्न,
किसी व्यक्ति की,
आँखों से देखो,
और सोचो,
जीवन,
ये कैसा व्यापार है ?

ध्वनि,
कई प्रतिध्वनियो में,
गूंजेगी तुम्हारे कानो में
जीवन असार है,
जीवन
असार है |

ये स्वप्नों के पीछे,
दौड़ती जिंदगी,
सुख-दुःख के धुप-छाव से,
जूझती जिंदगी,
बचपन,
जवानी,
बुढापे में हरपल,
कुछ खोजती जिंदगी,
यूँ ही रीत जाती है,
उमरिया बीत जाती है |

अब जाने की है तैयारी,
टूटी भ्रम की झूठी खुमारी,
क्या खोया, क्या पाया,
आकलन बड़ा पेचीदा है |

यू तो है
एश्वर्य कदमो में,
तुने युग को जीता है,
पर क्या जा पायेगा साथ तेरे ?
ये संसार मिथ्या है,
ये एश्वर्य झूठा है |

अब जाना,
जो जा सकता था,
उसे तो तुने संजोया ही नहीं,
अपने में खोया रहा,
दुखियों के दर्द पर,
तू कभी रोया ही नहीं |

तू हरपल लोभ,
ईर्ष्या,
अंहकार के बीज,
जीवन के गर्भ में बोता रहा,
अपनी हर जीत पर,
खुश होता रहा,
पर हर पल,
खुद को खोता रहा |

काश,
जो ये आँखे,
पहले मिली होती,
तो आज,
तन्हाई में भी,
एक अलग ख़ुशी होती |

हरपल भीड़ में,
गुजारी थी जिंदगी मैंने,
आज इस तन्हा सफर में,
कुछ तो रौशनी होती |