रविवार, 24 मार्च 2024

सोचता हूँ ॰॰॰॰

 


सोचता हूँ, कुछ लिखूँ, तेरी मदभरी आखों के नाम,
पर नशे में झूमने का भय, मेरे अन्तर में हैं।

सोचता हूँ, झाँक लूँ, तेरी रूह में, दृग द्वार से,
पर पाश में, तेरी रूह के, बंधने का भय अन्तर में हैं।

सोचता हूँ, गोते लगाऊँ, तेरी नयन-सागर तलहटी में,
पर नव सीखा मैं, डूबने का भय, मेरे अन्तर में हैं ।

सोचता हूँ, विश्राम कर लूँ, तेरी पलकों की गहरी छाँव में,
पर तेरी रुप आभा से मेरे, जलने का भय, अन्तर में हैं।

सोचता हूँ, घर बना लूँ, तेरी चक्षु के ब्रह्मांड में कहीं,
पर अखिल विस्तार में, खोने का भय, अन्तर में हैं।

सारा जीवन ही होली है।


 

त्योहार तो केवल है प्रतीक,
अगिनत रंगो की झोली है,
भेद, बिभेद से एकीकृत
सारा जीवन ही होली है।

यहाँ तो है उत्साह- निराशा,
हर्ष-विषाद घिरी प्रत्याशा,
प्रीति-अप्रीति, स्नेह-घॄणा संग,
बनती-मिटती ढ़ेरों अभिलाषा,
मित्र-शत्रु, अपने-पराए से,
सजी हुई रंगोली है,
भेद-बिभेद से एकीकृत
सारा जीवन ही होली है।

यहाँ खोज आनंद की है,
पर साथ वेदना चलती है,
यहाँ मिलन पोसे जाते,
संग-संग बिछड़न भी पलती है,
उँचा-नीचा, सम-विषम है पथ,
चलती लोगों की टोली है,
भेद, बिभेद से एकीकृत
सारा जीवन ही होली है।

जैसे सब रंग मिल करके,
मनभावन छवि बनाते है,
रंगने और रंगे जाने वाले,
दोनो सुख पाते है,
वैसे हीं दातार-जीव की,
यह अनुपम हमजोली है,
भेद, बिभेद से एकीकृत
सारा जीवन ही होली है।

मंगलवार, 12 मार्च 2024

धैर्य धर।


 

घोर मावस सा अंधेरा,
किरण पथ राहू ने घेरा,
विकट उबरन, कठिन हर क्षण,
विश्वास को प्रज्वलित कर,
तू धैर्य धर।

हर अंत से

शुरूआत का है पथ निकलता,
ठोकर लगे से कब रूका,
चैतन्य जो, फिर-फिर सम्भलता,
संघर्ष पर ही फलित होता दिव्य फर,
तू धैर्य धर।

है कौन वैसी रात
,
जिसपर दिवस का जय रहा वंचित ?
कर्म का है विधान यह,
सत् कर्म गर, परिणाम निश्चित,
अडिग मन, बढ़ता चरण, उठता निखर,
तू धैर्य धर।

बीज
तत्क्षण ही नही वटबृक्ष बनता,
अपनी गति से हीं 
समय हर दृश्य जनता,
नियत पल मे, कर्म फलता है प्रखर,
तू धैर्य धर।


सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

वो छली


वो छली,
है द्वेष जिसका अस्त्र है,
वो गहन मावस मे भी मदमस्त है,
चेतना की निंद टूटे क्यूँ भला ?
वो हकों की लूट मे हीं व्यस्त है।

वो निशा दृष्टा,
आभ दिखला के क्या ?
वो दिवस मे,
जन्म से हीं सूर है।
झकझोरने का श्रम वृथा हीं जाएगा,
वो ठूँठ है,
फलहीन है,
मगरूर है।

कब लोलुपित सिंह को,
कोई  मेमना समझा सका ?
कब बिना संग्राम के,
कोई कौरवों को झुका सका ?

जिन्दगी संघर्ष है,
संघर्ष कर,
विनती, विनय को त्याग,
अब तू अस्त्र धर।
हार या के जीत में,
तुम एक हो,
युद्ध या के प्रीत में,
तुम नेक हो।

साक्षी है इतिहास,
समर अपरिहार्य है,
जब न्याय हीं हो दांव पर,
स्वीकार्य है।

सोमवार, 15 अप्रैल 2019

माया



माया
दुनियाँ को
नचायाँ है।

भरम है योग,
वियोग भरम,
जग भरम का
साया है।

माया ------।

जो आया है,
जाएगा एक दिन,
अटल जगत की
रवानी।
मोह का रोग
तबहू नही छूटे,
पल-पल तड़पाया है।

 माया --------।

स्नेह का बन्धन,
सृजन किया धन,
कुछ भी चिर न रहेगा ।
तापर रे मन,
कहाँ तू उलझा,
किस डोर बंधाया है।

माया ----------।

ना गन्तव्य,
ना राह है निश्चित,
बढ़े कहाँ तू जाता ।
थम कर,
सुलझा ले,
जो अब तक,
तूने उलझाया है।

 माया
दुनियाँ को
नचायाँ है।

बुधवार, 12 सितंबर 2018

इच्छित नहीं सही



हों जैसे वैसे दिखें,
चुनें, गुणें अनुराग,
कानन को सुख देत हैं,
भ्रमित न हो तू जाग |

हों प्रकृत अनुरूप ही,
यह है पशु का भाग,
नर के ही सामर्थ्य है,
आत्म चयन, निज राग |

सोच, ख़ालिस अनुराग ही,
नहीं स्वयं में पूर्ण,
सही-गलत के भेद से,
मुक्त चेतना चूर्ण |

सो दिखना,
जो हो उचित,
द्वय अंतर और बाह,
पथिक,
हटो भटकाव से,
चुनों सही जो
राह |

दोस्ती कर ले |



दोस्ती कर ले,
तू अपनी जान से,
मुक्त कर खुद को,
वृथा अभिमान से |

पीढ़ियों की दूरियों
को पाट तू,
काट एकल दृष्टि,
सम्यक् ज्ञान से |

गत का रोना छोड़,
नव में घ्यान दे,
कुछ सीखा, कुछ सीख,
थोडा मान दे |

काल की तू चाल
को पहचान ले,
हार में भी जीत,
ऐसा मान ले |

अपनी दुआओं में,
तू उनको जोड़ ले,
उनकी ख़ुशी, तेरी है,
चित को मोड़ ले |

स्वप्न में उनके
तू अपने कर फना,
उड़ान उनके,
पर तू अपने जोड़ दे |
 
अपमान के तू घूँट
से बच जायेगा,
अंश से तू,
मित्र सा सुख पायेगा |

निश्चिंत होकर,
इस धरा से जायेगा,
मिटकर भी स्वय को,
चित में उनके पायेगा |